
पिथौरा।3/01/2026 क्षेत्र के ग्राम जम्हर में भी पुष पुन्नी छेरछेरा का त्यौहार बड़े धूमधाम के साथ मनाया गया जम्हर बसना विधानसभा के कृषि प्रधान एवं प्रथम ग्राम है। जो इन दिनों अपनी प्राचीन लोक परंपराओं को लेकर यहां की युवाओं में काफी उत्साह देखा गया पूर्व वर्षों से अधिक उत्साह इस वर्ष छेरछेरा पर्व में युवाओं का देखने को मिला स्वादिष्ट ठेठ छत्तीसगढ़ी व्यंजन ऐरसा, सुंहारी ठेठरी खुरमी, जैसे लजीज छत्तीसगढ़ी व्यंजनों की देशी मिठास के साथ ग्राम वासियों ने इस वर्ष एक नये उत्साह के साथ पुष पुन्नी छेरछेरा का त्यौहार मनाया सुबह से ही गांव की गलियों में त्योहार का रौनक देखने को मिला जिसमें बच्चे बूढ़े माता बहने हर वर्ग के लोग घर घर जाकर “छेरछेरा कोठी के धान ला हेर हेरा”स्लोगन से प्रत्येक घरों में लोगों की टोली का हलचल देखने को मिला और इस पर्व को मनाते दिखे।

वैसे तो इस पर्व का अपना ही ऐतिहासिक महत्व है वही ग्राम में इस वर्ष नए पिढी के अनेक युवाओं की टोलीयों ने अपनी परंपरा को जीवंत रखने के लिए अपनी संस्कार और अपनी रीति रिवाज से जुड़कर इस पर्व को और भी अधिक आकर्षक बना दिया जो प्राचीन तीज त्योहार से युवाओं को जोड़ रखने का एक सुखद अनुभव रहा। और छत्तीसगढ़ जितना भी आधुनिकता के पथ पर अग्रसर बढ़ जाए परंतु अपनी जड़ों को मजबूत रखने के लिए अपनी लोक परंपरा तीज त्योहार से जुड़कर युवाओं ने अपनी सहभागिता निभाई। जो छत्तीसगढ़ का मूल आधार है।

छेरछेरा त्योहार छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख फसल कटाई के बाद पौष पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला लोकपर्व है, जिसका इतिहास कलचुरी राजा कल्याणसाय के 8 साल बाद लौटने से जुड़ा है, जब प्रजा के प्रेम के बदले रानी ने धन वर्षा की और इसे हर साल मनाने का आदेश दिया; यह भगवान शिव और माता अन्नपूर्णा से भी जुड़ा है, जहाँ दान-पुण्य, सामूहिकता, और अहंकार त्याग का संदेश है, जिसमें बच्चे-युवा ‘छेरछेरा, माई कोठी के धान ला हेर हेरा’ गाते हुए अनाज मांगते हैं.
ऐतिहासिक संदर्भ
कलचुरी राजा का प्रसंग: ऐतिहासिक रूप से, छेरछेरा की शुरुआत कलचुरी शासक राजा कल्याणसाय के 8 साल के वनवास के बाद रतनपुर लौटने पर हुई, जहाँ प्रजा के असीम प्रेम और स्वागत से प्रसन्न होकर रानी फुलकेना ने सोने-चांदी की वर्षा करवाई और इस दिन को हर साल मनाने का आदेश दिया, जो फसल उत्सव से जुड़ गया.
पौराणिक मान्यता
शिव-अन्नपूर्णा: पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी दिन भगवान शिव ने माता अन्नपूर्णा (शाकंभरी देवी) से भिक्षा मांगी थी, इसलिए यह दिन दान-पुण्य और अन्नपूर्णा पूजा से जुड़ा है, साथ ही मां शाकंभरी जयंती भी मनाई जाती है.
सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व
फसल उत्सव: यह नई फसल (धान) के घर आने की खुशी में मनाया जाता है, जब किसान कटाई और मिसाई पूरी कर लेते हैं.
दान-पुण्य और सामूहिकता: बच्चे और युवक घर-घर जाकर ‘छेरछेरा, माई कोठी के धान ला हेर हेरा’ (मां, कोठी के धान को ढूंढो/दो) गाते हुए अनाज, साग-भाजी और पैसे मांगते हैं, जिससे समाज में एकता और भाईचारे की भावना बढ़ती है.
अहंकार का त्याग: यह पर्व बड़े-छोटे के भेदभाव और अहंकार को खत्म करता है, क्योंकि दान देना और दान लेना दोनों ही महत्वपूर्ण माने जाते हैं.
कैसे मनाते हैं
लोग पारंपरिक वाद्य यंत्रों (मांदर, ढोलक) के साथ गाते-नाचते हुए अनाज मांगते हैं और दान करते हैं.
घर पर ‘आइरसा’, ‘सोहारी’, ‘उड़द-बड़ा’ जैसे छत्तीसगढ़ी व्यंजन बनाए जाते हैं.
डंडा नृत्य और सुआ नृत्य भी होता है.



