
संपादक -लोचन चौहान
रायपुर(छ.ग.) 5/07/2025 वैसे तो छत्तीसगढ़ में वन संपदा की कमी नहीं है यहां की लगभग 44.21% भूभाग वनो से ढंकी हुई है
छत्तीसगढ़ में वनों का प्रतिशत 44.21% है।
छत्तीसगढ़ राज्य का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 1,35,191 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें से 59,772 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र है। यह प्रतिशत 44.21% बनता है, जो राज्य के कुल क्षेत्रफल का लगभग आधा हिस्सा है।
छत्तीसगढ़ के भूगर्भ में बहुमुल्य खनिज संपदाओं की प्रचूर उपलब्धता है

छत्तीसगढ़, भारत के सबसे समृद्ध खनिज भंडारों में से एक है। यहाँ कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, डोलोमाइट, चूना पत्थर, टिन अयस्क और हीरे जैसे महत्वपूर्ण खनिज प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं. राज्य में 28 प्रकार के प्रमुख खनिज पाए जाते हैं, जिनमें से 20 का दोहन और विपणन किया जाता है.
छत्तीसगढ़ में पाए जाने वाले प्रमुख खनिज:
कोयला:
छत्तीसगढ़, भारत में कोयला उत्पादन में अग्रणी राज्य है, और यहाँ देश का दूसरा सबसे बड़ा कोयला भंडार भी है.
लौह अयस्क:
राज्य में लौह अयस्क का भी महत्वपूर्ण भंडार है, और यह देश के लौह अयस्क उत्पादन में तीसरे स्थान पर है.
बॉक्साइट:
छत्तीसगढ़ में बॉक्साइट का भी महत्वपूर्ण उत्पादन होता है.
डोलोमाइट:
राज्य में डोलोमाइट का भी प्रचुर भंडार है, और यह देश के डोलोमाइट उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान देता है.
चूना पत्थर:
छत्तीसगढ़ में चूना पत्थर का भी व्यापक उत्पादन होता है, और यह राज्य के सीमेंट उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण कच्चा माल है.
टिन अयस्क:
छत्तीसगढ़, भारत का एकमात्र राज्य है जो टिन अयस्क का उत्पादन करता है.
हीरा:
राज्य में हीरे का भी भंडार है, और यह देश के हीरे उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान देता है.
अन्य महत्वपूर्ण खनिज:
मैंगनीज, क्रोमियम, कोबाल्ट, मोलिब्डेनम, निकल, टंगस्टन, वैनेडियम, फेरोफॉस्फोरस, तांबा, सीसा, जस्ता, प्लेटिनम, यूरेनियम और थोरियम जैसे खनिज भी छत्तीसगढ़ में पाए जाते हैं.
इसके अलावा, कोरंडम, क्ले, क्वार्टजाइट, बेस मेटल्स, फ्लोराइट, बेरिल, एंडालुसाइट, कायनाइट, सिलिमेनाइट, टैल्क, सोपस्टोन और गार्नेट जैसे अन्य खनिज भी यहाँ पाए जाते हैं.

छत्तीसगढ़ हीं नहीं अपितु पूरे भारत में आधुनिकीकरण और विकास के नाम पर वनों की अंधाधुंध कटाई से लगातार सीमटते जा रहे वनक्षेत्र और पर्यावरण संकट पर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 15 मई, 2025 को एक ऐतिहासिक फैसले में सभी राज्यों के मुख्य सचिवों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासकों को निर्देश दिया है कि वे विशेष जांच टीमों का गठन करें। इन टीमों का काम आरक्षित वन भूमि पर हुए अवैध आवंटनों की जांच करना होगा।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यह जांच की जाए कि कहीं राजस्व विभाग के कब्जे में मौजूद आरक्षित वन भूमि किसी व्यक्ति या संस्था को ऐसे काम के लिए तो नहीं दे दी गई है, जो जंगलों से जुड़ा न हो।

अदालत ने सख्ती दिखाते हुए कहा कि यदि ऐसी कोई भी जमीन किसी के कब्जे में है, तो राज्य सरकारें और केंद्र शासित प्रदेश उन्हें वापस लेकर वन विभाग को सौंपने के लिए कदम उठाने चाहिए। आदेश में यह भी कहा गया है कि अगर किसी वजह से भूमि वापस लेना जनहित में न हो, तो संबंधित व्यक्ति या संस्था से उसकी पूरी लागत वसूल की जाए और उस धनराशि का इस्तेमाल वनों के विकास में किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच जिसमें मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई, न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह और न्यायमूर्ति कृष्णन विनोद चंद्रन शामिल थे, ने यह भी कहा कि यह पूरी प्रक्रिया एक साल के भीतर पूरी हो जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि, “यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि अब से आरक्षित वन भूमि का उपयोग केवल वनो के विकास के लिए ही किया जाना चाहिए।”
गौरतलब है कि यह आदेश पुणे जिले के कोंढवा बु्द्रुक इलाके में आरक्षित वन भूमि को अवैध रूप से रिची रिच को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी (आरआरसीएचएस) को देने से जुड़े एक मामले में दिया गया।
जंगल में मकान जायज? सुप्रीम कोर्ट ने उठाया था सवाल
सर्वोच्च अदालत ने कहा कि “28 अगस्त, 1998 को पुणे जिले के कोंढवा बुद्रुक में कृषि उद्देश्यों के लिए 11.89 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि का आवंटन और उसके बाद 30 अक्टूबर, 1999 को रिची रिच को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी के पक्ष में इसकी बिक्री की अनुमति देना पूरी तरह से अवैध था।“
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि 3 जुलाई, 2007 को पर्यावरण मंत्रालय द्वारा आरआरसीएचएस को दी गई पर्यावरण मंजूरी अवैध है। ऐसे में अदालत ने उस मंजूरी को रद्द कर दिया। कोर्ट ने आदेश दिया कि राजस्व विभाग के कब्जे में मौजूद जमीन जो वन भूमि के रूप में आरक्षित है उसे तीन महीनों के भीतर वन विभाग को सौंप दिया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के इस कदम से यह साफ है कि अब जंगलों में निर्माण से जुड़ी गतिविधियों पर सख्ती से नजर रखी जाएगी, ताकि पर्यावरण और वनवासियों के अधिकारों की रक्षा की जा सके।
कोर्ट ने कहा है कि अगर जंगल में घर बनाना कानूनी रूप से संभव है, तो इससे जुड़े सभी नियम, कानून और आदेशों को हलफनामे के साथ पेश किया जाए। दोनों सरकारों को यह विस्तृत हलफनामा तीन सप्ताह के भीतर अदालत में दाखिल करना होगा।
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 29 अप्रैल, 2025 को मध्य प्रदेश और केंद्र सरकार से पूछा था कि क्या जंगल में मकान बनाना जायज है? अगर हां, तो इसके लिए कौन-कौन से नियम-कानून हैं?





