
(छ.ग. सृजन) पिथौरा में नकली नोट बनाने से ज्यादा सुरक्षित ;
शासकीय और आदिवासियों की जमीनों को टुकड़ों में बेचने का गोरखधंधा . . .
प्रशासन और रजिस्ट्रार के सहयोग से करोड़पति बनने का फार्मूला आजमायें @ –
विशेष संवाददाता-आलेख
(डा.लालबहादुर महान्ती)

विष्णुदेव साय जी
मान्यवर मुख्यमंत्री,
छत्तीसगढ़ शासन द्वारा आयोजित सुशासन तिहार 2025 के दौरान सोशल मीडिया के माध्यम से प्रदेश के मुख्यमंत्री महोदय से कुछ बात कहना चाहता हूं ,
आदिवासियों के हित में बात करना चाहता हूं।हालांकि आप पूरे प्रदेश के लिए मुख्यमंत्री हैं और इस पद पर आने के पहले आपका बहुत ही लंबा राजनीतिक जीवन और पद का अनुभव है लेकिन आदिवासी वर्ग से आने के कारण आपको आदिवासियों के आर्थिक तकलीफों के विषय में जानकारी है ही – इसका मुझे भान है इसलिए एक बड़ी बात कहना चाहता हूं।
आदिवासियों को संविधान और शासन की ओर से आर्थिक और सामाजिक समानता का अधिकार देने के लिए आरक्षण का अधिनियम लागू किया गया है,उस आधार पर आरक्षण लागू है और वे सभी उसका फायदा भी ले रहे हैं। लेकिन एक दूसरा पहलू यह है कि आदिवासियों की जो ज़मीनें है
आदिवासी की 1 करोड़ की जमीन 20 लाख में बिकती है
उसको खरीदने बेचने का जो नियम है वह बेचने के पूर्व शासन और कलेक्टर से अनुमति लेने का है।जहां तक भूमिहीन या गरीब आदिवासियों को शासन से मिले हुए जमीन को बेचने के पूर्व अनुमति लेने का अनिवार्य नियम समझ में तो आता है और वो सभी वर्गों के लिए है लेकिन जिस आदिवासी ने अपने खुद के मेहनत या आय से भूमि अर्जित की है उसके लिए भी भूमि को बेचने के पहले अनुमति लेनी पड़ती है जो उनके शोषण का पर्याय बनता जा रहा है।

जैसे किसी सामान्य व्यक्ति की जमीन यदि सड़क किनारे है और उसकी उसकी कीमत 1 करोड़ रूपया है लेकिन ठीक उसके बाजू में आदिवासी की जमीन है तो उसको 20 लाख रुपए में भी लेने में कोई हिचकता है और आखिर में इनकार कर देता है। इस बंधन के कारण वह आदिवासी परिवार आर्थिक शोषण का शिकार हो जाता है,उसके बच्चों की पढ़ाई रुक जाती है,आवास खंडहर रहता है और किसी बड़े व्यवसाय की दृष्टि से वह पंगू और मृत प्राय ही रहता है । वह आदिवासी हर समय दूसरे के भरोसे ही रहता है,ग्राहक ही रहता है यानी मेहनत करके देने वाला ही रहता है और अपनी आर्थिक विषमता के चलते लेने वाला पद प्राप्त नहीं कर पाता।

भारत की माहामहिम राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू
हालांकि बदली हुई परिस्थितियों में आदिवासियों का हर क्षेत्र में उत्थान हुआ है जिसका उदाहरण आपको मुख्यमंत्री पद पर सुशोभित होते हुए और जीवन के कटु अनुभवों से गुजर कर आध्यात्म की ओर रुझान रखने वाली माननीया प्रथम महिला भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जी को देखकर बड़ी खुशी और अपार संतोष होता है। वैसे तो संविधान में अनेक प्रकार के संशोधन होते रहते हैं लेकिन मैं आदिवासियों के करीब रहा हूं उनके साथ रहता हूं और उनकी स्थिति से वाकिफ होते हुए यह चाहता हूं कि आप कोई ऐसा कानून या नियम बनाएं जो आदिवासियों की जमीनों के संबंध में हो,उनके जमीन का सामान्य जमीन जैसा कीमत हो या दोगुना कीमत का हो या चार गुना हो।यह ऐसा हो भी हो सकता है कि आदिवासी ठगा ना जाए।

उसके जमीन बेचने के पहले वह शासन या कलेक्टर को सूचना दे,उसके खाते में पर्याप्त पैसा आए तो उसको बेच सके। अनुमति नहीं होना चाहिए कि जमीन के बदले जमीन या कोई कारण ना हो,सिर्फ सूचना हो ताकि वह ठगाने से बचा रहे।उसकी जमीन का भी करोड़ों में कीमत हो और वह करोड़ों प्राप्त करके अपने परिवार और बच्चों का पालन पोषण व्यवसाय कर सके।ऐसा कोई आप नियम लाएं ताकि पूरे भारत के लिए,खासकर आदिवासियों के वर्ग के लिए वह कानून मील का पत्थर साबित हो और उनका आर्थिक रूप से उत्थान हो।

हमारे यहां पिथौरा छत्तीसगढ़ में एक ऐसा तहसील है जहां आदिवासियों की जमीनों को फर्जी डायवर्सन और फर्जी मंजूरी के माध्यम से गैर-आदिवासियों को खरीदा बेचा जा रहा है जो हजारों एकड़ में मेरे अनुभव के आधार से ज्यादा है। दलाल अपना नियम चला रहे हैं और प्रशासन पंगू है। फर्जीवाड़ा से पीड़ितों को आर्थिक नुकसान हो रहा है।आदिवासी इसका शिकार हो रहे हैं, उनके नाम से जमीने खरीदी बेची जा रही है,वे गरीबी रेखा में अभी भी राशन लेते हैं और उनके नाम से जो लोग बेच रहे हैं।

25 करोड़ का बेनामीदार मृतक आदिवासी रमेश गोड़
जो जमीन के दलाली में व्यस्त हैं उनके आलीशान कोठे है। लाखों के कार में घूम रहे हैं, करोड़ों की बेनामी सम्पत्ति है, प्रभावशाली प्रतिष्ठा बनाए हुए हैं लेकिन जब कोई जांच होता है तो वह आदिवासी पकड़ा जाता है और उसके नाम की जमीन जप्त हो जाती है बदनाम वह होता है लेकिन उसका फायदा नहीं ले पता है।भले ही वह इनकम टैक्स के रिकॉर्ड में करोड़पति आसामी हो लेकिन उसका जीवन-यापन साधारण स्तरीय होता है।

ऐसे बहुत सारे मामले यहां हैं और उन आदिवासियों में जंघोरा का मृतक रमेश गोंड, बरेकेल खुर्द का मृतक तुलसी गोंड, जीवित पत्नी मानकीबाई, उसतराम और उसका पुत्र सुखराम,अमरुत सतनामी,पत्नी कौशिल्याबाई,राजा सेवैया खुर्द का श्याम नेताम, लहरौद का मृतक संतराम ध्रुव,अग्रेश्वर गोंड, पंचराम गोंड, नोहरसिंग,हरिजन मृतक कोटवार घुरऊ गांडा,मृतक लक्ष्मण सारथी और खास गरीब लोग,इनके नाम से बने हुए फर्जी शासकीय पट्टे और उनकी खरीदी बिक्री का अरबों का गोरखधंधा . . हजारों की गिनती में है।समाज के सभी वर्गों से बात करने के बाद मैं आपसे कहना चाहता हूं कि कृपया इस मुद्दे पर आप ध्यान दें और एक बड़ी कार्यवाही करें।आदिवासियों को गरीबी से मुक्ति दिलाते हुए उन्हें निजी जीवन में करोड़पति बनायें।आप का भला होगा और आदिवासी भाइयों पर उपकार होगा।
????????जय गुरु गोरखनाथ ????????




