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बारनवापारा अभ्यारण टाइगर रिजर्व की घोषणा में हो रहे विलंब..पर वन्यप्राणी विशेषज्ञों संरक्षण विदों पर्यावरण प्रेमियों ने जताई चिंता।

बलौदाबाजार 13.10.2026 बारनवापारा अभ्यारण्य को पूर्ण रूप से टाइगर रिजर्व घोषित करने में हो रहे विलंब को लेकर वन्यप्राणी विशेषज्ञों और संरक्षणविदों वन्य जीव एवं पर्यावरण प्रेमियों के द्वारा वन्य जीवों के रहवास अस्तित्व, खाद्य श्रृंखला और सुरक्षा पर गंभीर चिंताएं जताई हैं विशेषज्ञों के अनुसार,अधिसूचना में देरी के कारण मुख्य रूप से निम्नलिखित चुनौतियां और प्रभाव सामने आ रहे हैं

सुरक्षा तंत्र और तकनीकी निगरानी की कमी अपर्याप्त सुरक्षा बजट

वाइल्डलाइफ सैंचुरी अभ्यारण्य की तुलना में एक नोटिफाइड टाइगर रिजर्व को प्रोजेक्ट टाइगर एनटीसीए के तहत कहीं अधिक केंद्रीय फंड, आधुनिक हथियार, और विशेष सुरक्षा बल एस.टी.पी.एफ मिलते हैं। विलंब के कारण शिकार-विरोधी गश्त के लिए उन्नत बुनियादी ढांचे की कमी बनी हुई है हाई-टेक सर्विलांस की सीमाएं:- यद्यपि वन विभाग थर्मल ड्रोन और स्थानीय स्तर पर निगरानी का प्रयास कर रहा है, लेकिन आधिकारिक टाइगर रिजर्व न होने से 24 घंटे चलने वाले सेटेलाइट ट्रैकिंग और रेडियो-कॉलर आधारित कमांड सेंटर्स का स्थायी सेटअप स्थापित करने में बाधा आ रही है।

‘प्रेय बेस’ शिकार की उपलब्धता और खाद्य श्रृंखला का संकट

घास के मैदानों का प्रबंधन: बाघों के स्थायित्व के लिए चीतल, सांभर और गौर जैसे शाकाहारी जीवों का पर्याप्त घनत्व होना अनिवार्य है।प्रसिद्ध बाघ संरक्षण विशेषज्ञ अजय शंकर दुबे जैसे जानकारों का मानना है कि अभ्यारण्य में कमजोर प्रेय-बेस को मजबूत करने और लेन्टाना जैसी आक्रामक खरपतवारों को पूरी तरह से हटाकर बेहतर ग्रासलैंड बनाने में देरी वन्यप्राणियों के भोजन चक्र को प्रभावित करती है।

मानव-वन्यजीव संघर्ष: भोजन की कमी या रहवास सिकुड़ने पर वन्यजीव अक्सर बाहर वनक्षेत्र में बसे गांवों की ओर रुख करते हैं

इको-सेंसिटिव जोन और विस्थापन की वैधानिक प्रक्रिया में देरी सुरक्षित गलियारे का अभाव

आधिकारिक दर्जा न मिलने से अभ्यारण्य के आसपास के क्षेत्रों में इको-सेंसिटिव जोन और साइलेंस जोन कड़ाई से लागू नहीं हो पाते। इससे अवैध निर्माण,पर्यटन का दबाव और सड़कों पर भारी वाहनों के कारण वन्यजीवों के प्राकृतिक कॉरिडोर बाधित होते हैं।

ग्रामीणों का पुनर्वास: हालांकि कोर एरिया से ग्रामीणों जैसे ग्राम बार नवापारा अभ्यारण के अंदर की ग्रामों ने स्वेच्छा से विस्थापन का प्रस्ताव स्वीकार किया है,लेकिन टाइगर रिजर्व घोषित होने पर मिलने वाले भारी-भरकम नेशनल फंड और केंद्रीय नियमों के बिना बड़े पैमाने पर पुनर्वास और कॉरिडोर को पूरी तरह इंसानी दखल से मुक्त करना एक धीमी प्रक्रिया बनी हुई है। कुछ वन्य प्राणी प्रेमी और विभागीय जानकार बताते हैं की बार-नवापारा अभ्यारण क्षेत्र में दो बाघ विचरण कर रहे हैं लेकिन उनकी सुरक्षागत दृष्टि को ध्यान में रखते हैं उनकी जानकारी साझा करने में वन विभाग गोपनीयता बरत रही है क्षेत्र में लगातार हाथियों के झुंड भी विचरण करते इन दोनों देखा जा रहा है जिससे बार नवापारा अभ्यारण को टाइगर रिजर्व घोषित करने की दिशा में राज्य एवं केंद्र सरकार के द्वारा कोई महत्वपूर्ण अधिसूचना जारी करने की कयास लगाए जा रहे हैं लेकिन आने वाले समय में देखने वाली बात होगी कि आखिर कब तक बरनापारा अभ्यारण को टाइगर रिजर्व क्षेत्र के रूप में कब तक अधिसूचित की जाती है।प्राकृतिक रूप से आने वाले बाघों के स्थायित्व पर खतरा बाघों का पलायन

पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश के जंगलों से कॉरिडोर के रास्ते युवा बाघ जैसे हाल के वर्षों में देखा गया नर बाघ सुरक्षा और नए क्षेत्र की तलाश में बारनवापारा पहुंच रहे हैं। विशेषज्ञों जैसे पूर्व फील्ड डायरेक्टर आर. श्रीनिवास मूर्ति का सुझाव है कि यदि समय रहते इसे टाइगर रिजर्व बनाकर सुरक्षा चाक-चौबंद नहीं की गई और दो मादा बाघों को लाने का री-इंट्रोडक्शन प्रोग्राम तेज नहीं किया गया, तो यह क्षेत्र बाघों के लिए स्थायी ठिकाना नहीं बन पाएगा

बीते कुछ वर्षों से बारनवापारा अभ्यारण के जंगलों में प्राकृतिक रूप से बाघों का आवागमन हो रहा है इसलिए वन विभाग लगातार बाघों के संरक्षण संवर्धन के लिए क्रियाशील है बाघों के भोजन और उनके रहवास के लिए भी अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियों के साथ साथ बाघों की रहवास के अनुसार वैज्ञानिक सुझाव के अनुकूल खाद्य श्रृंखला की सूची के अनुसार लंबे समय तक उनके भोजन के लिए उपलब्ध वन्य प्राणियों की विभिन्न प्रजातियां व पर्याप्त विशाल शृंखला बार नवापारा अभ्यारण में मौजूद है।बारनवापारा वन्यजीव अभयारण्य छत्तीसगढ़ राज्य के बलौदा बाजार और महासमुंद जिले की सीमा पर स्थित एक प्रमुख संरक्षित वन क्षेत्र हैस्थापना वर्ष: 1972 के वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत 1976 में हुई थी।

क्षेत्रफल: लगभग 244.66 से 245 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है।

नामकरण: इसका नाम ‘बार’ और ‘नवापारा’ नामक दो वनग्रामों के आधार पर रखा गया है।

प्रमुख नदियां: यहाँ से बालमदेही नदी और जोंक नदी प्रवाहित होती हैं।

वनस्पति: यहाँ साल, सागौन और मिश्रित वनों के साथ-साथ बांस के घने जंगल पाए जाते हैं।वन्यजीव एवं जैव विविधताप्रमुख जानवर: यहाँ तेंदुआ, भालू, गौर इंडियन बाइसन, चीतल, सांभर, नीलगाय, जंगली सूअर और विभिन्न प्रकार के हिरण पाए जाते हैं।

बाघ की आवाजाही: हालांकि यह एक वन्यजीव अभयारण्य है पूर्ण टाइगर रिजर्व नहीं, लेकिन उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व और अन्य क्षेत्रों से बाघ अक्सर इस क्षेत्र में विचरण करते देखे गए हैं।

पक्षियों की प्रजातियाँ: यहाँ पक्षियों की 150 से अधिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें मोर, तोते, बुलबुल और विभिन्न प्रवासी पक्षी शामिल हैं।पर्यटन एवं सफारीसफारी सुविधा: पर्यटकों के लिए यहाँ जीप सफारी की सुविधा उपलब्ध रहती है

निकटतम शहर और पहुँच:

यह राज्य की राजधानी रायपुर से लगभग 106 किलोमीटर दूर स्थित है।

रायपुर-संबलपुर राष्ट्रीय राजमार्ग NH-53 पर स्थित पटेवा शहर से यहाँ आसानी से पहुँचा जा सकता है।

यह स्थान पिथौरा से भी काफी नजदीक है

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