Post: पिथौरा वन परीक्षेत्र में जंगलों की कटाई से चिखती धरती.. वन्यप्राणी व बहुमूल्य वनस्पतियों के अस्तित्व पर संकट..।

पिथौरा वन परीक्षेत्र में जंगलों की कटाई से चिखती धरती.. वन्यप्राणी व बहुमूल्य वनस्पतियों के अस्तित्व पर संकट..।

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पिथौरा, 09 जून 2026। वनों की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के लिए सरकार द्वारा करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन पिथौरा वन परिक्षेत्र के पूर्व पिथौरा परिवृत्त अंतर्गत कैलाशपुर के जंगलों से जो तस्वीर सामने आ रही है, वह विभागीय दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती है। ग्रामीणों और क्षेत्रवासियों का आरोप है कि जंगलों में मिश्रित प्रजाति के पेड़ों की अवैध कटाई लगातार जारी है, जबकि जिम्मेदार अधिकारियों की ओर से प्रभावी कार्रवाई दिखाई नहीं दे रही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि कैलाशपुर सहित पूर्व पिथौरा के कई वन क्षेत्रों में लकड़ी तस्करों के हौसले इतने बुलंद हैं कि जंगलों के अंदरूनी हिस्सों में भी पेड़ों की कटाई खुलेआम की जा रही है। इसके बावजूद वन विभाग की निगरानी व्यवस्था पूरी तरह निष्क्रिय नजर आ रही है।

ग्रामीणों का आरोप है कि वनों की सुरक्षा के लिए वन सीमा क्षेत्र में बनाए गए मुनारे और लगाए गए तार फेंसिंग केवल कागजों तक सीमित दिखाई देते हैं। शासन द्वारा लाखों रुपये खर्च कर वन सीमा सुरक्षा को मजबूत करने का दावा किया गया, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।

क्षेत्रवासियों के अनुसार कई स्थानों पर फेंसिंग पोल निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं लगाए गए हैं। वहीं निर्धारित संख्या से कम पोल लगाकर कार्य पूरा दिखाने का प्रयास किया गया है। आरोप है कि योजना के नाम पर सीमित कार्य कर पूरी राशि का भुगतान निकाल लिया गया, जिससे शासकीय धन के दुरुपयोग की आशंका गहरा गई है।

इतना ही नहीं, हाल ही में वन सीमा निर्धारण के लिए बनाए गए सीमेंट मुनारों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कई स्थानों पर मुनारे अधूरे हैं या गुणवत्ता विहीन तरीके से बनाए गए हैं। यदि समय रहते इन खामियों को दूर नहीं किया गया तो भविष्य में वन भूमि अतिक्रमण और सीमा विवाद की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जिससे वन क्षेत्रफल प्रभावित होने का खतरा बढ़ जाएगा।

क्षेत्र के लोगों का मानना है कि यदि पूर्व पिथौरा वन परिक्षेत्र में किए गए फेंसिंग कार्य, मुनारा निर्माण और वन सुरक्षा मद में हुए खर्चों की निष्पक्ष तकनीकी एवं वित्तीय जांच कराई जाए तो बड़ी अनियमितताएं उजागर हो सकती हैं। साथ ही अवैध कटाई के पीछे सक्रिय तत्वों और उनकी संभावित संरक्षण व्यवस्था पर भी से पर्दा उठ सकता है।

वन संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं और कागजी दावों से संभव नहीं है। इसके लिए जमीनी स्तर पर ईमानदार निगरानी, जवाबदेही और पारदर्शिता आवश्यक है। कैलाशपुर और पूर्व पिथौरा के जंगलों से उठ रही शिकायतें इस बात का संकेत हैं कि अब केवल वृक्षारोपण की तस्वीरें नहीं, बल्कि वन सुरक्षा की वास्तविक स्थिति पर भी गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है।

“जंगल कटते रहे, फाइलें सजती रहीं! फेंसिंग-मुनारा के नाम पर लाखों खर्च, फिर भी वन माफियाओं के आगे बेबस दिख रहा पूर्व पिथौरा वन अमला”

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